Bihar Folk Dance: आंचल कुमारी दरभंगा। बिहार की बिहार की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा, झरनी लोकनृत्य, अब धीरे-धीरे लुप्त होने के कगार पर है। आधुनिकता की अंधी दौड़ में यह पारंपरिक कला अपनी पहचान खोती जा रही है, जिस पर कलाकारों और स्थानीय लोगों ने गहरी चिंता व्यक्त की है। हाल ही में, नगर पंचायत कमतौल अहियारी के वार्ड 11 में विश्वकर्मा पूजा के अवसर पर आयोजित झरनी नृत्य ने दूर-दराज से आए लोगों को मंत्रमुग्ध कर दिया, लेकिन इसके भविष्य को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं।
स्थानीय लोगों ने ढोल-मादल की थाप पर गोल घेरा बनाकर जब झरनी नृत्य की प्रस्तुति दी तो पूरा पंडाल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। पानी की तरह उछलते-कूदते पैर और हाथों की लयबद्धता ने दर्शकों को बांधे रखा। इस अद्भुत प्रदर्शन को देखने के लिए बड़ी संख्या में भीड़ उमड़ी थी, जिसने इस लोकनृत्य की लोकप्रियता को एक बार फिर साबित किया।
पुरखों की पहचान, अब सिर्फ गिनती के लोग जानते हैं
स्थानीय बुजुर्ग राजगीर महतो, राजेन्द्र महतो और रामबहादुर महतो ने बताया, ‘ये नृत्य हमारे पुरखों की पहचान है। पहले हर गांव में होता था, अब गिनती के लोग ही इसे जानते हैं।’
कला प्रेमियों का कहना है कि यह प्रसिद्ध लोकनृत्य सरकारी उपेक्षा के कारण दम तोड़ रहा है। इसे संरक्षित करने के लिए अब तक कोई ठोस पहल नहीं की गई है। कलाकारों को न तो प्रदर्शन के लिए उचित मंच मिल रहा है और न ही नई पीढ़ी को इस कला को सीखने का अवसर मिल पा रहा है। इस स्थिति ने स्थानीय कला समुदाय को निराश किया है।
कलाकारों की कला व संस्कृति विभाग से बड़ी मांग
वार्ड पार्षद अभिषेक कुमार सहित कई कलाकारों ने कला व संस्कृति विभाग से झरनी नृत्य को राजकीय लोकनृत्य की सूची में शामिल करने की मांग की है। उनकी प्रमुख मांगें इस प्रकार हैं:
- झरनी नृत्य को राजकीय लोकनृत्य की सूची में शामिल किया जाए।
- स्कूल-कॉलेजों में इसकी कार्यशालाएं आयोजित की जाएं ताकि नई पीढ़ी इसे सीख सके।
- कलाकारों को प्रोत्साहन राशि दी जाए, जिससे वे इस कला को जीवित रख सकें।
स्थानीय कला प्रेमी और गायक सुखदेव महतो ने इस स्थिति पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि अगर समय रहते इसे नहीं बचाया गया, तो आने वाले कुछ सालों में यह सिर्फ किताबों में ही सिमट कर रह जाएगा। उन्होंने संस्कृति विभाग से तत्काल ध्यान देने और इस सांस्कृतिक धरोहर को बचाने के लिए ठोस कदम उठाने का आग्रह किया है। इस अनोखे Bihar Folk Dance को बचाने के लिए सरकारी हस्तक्षेप अत्यंत आवश्यक है, ताकि यह पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवंत रह सके।







