Sanskrit Darbhanga: आधुनिक विज्ञान और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के लिए प्राचीन संस्कृत भाषा एक नया मार्ग प्रशस्त कर सकती है। दरभंगा स्थित संस्कृत विश्वविद्यालय में आयोजित संस्कृत सप्ताह कार्यक्रम के पाँचवें दिन यह महत्वपूर्ण बात सामने आई। ‘संस्कृतं विज्ञानं च’ विषय पर हुई संगोष्ठी में वक्ताओं ने संस्कृत के वैज्ञानिक स्वरूप और आधुनिक तकनीक से इसके गहरे संबंध पर प्रकाश डाला।
विश्वविद्यालय के अध्यक्ष छात्र कल्याण प्रो. पुरेंद्र वारिक ने संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए कहा कि संस्कृत केवल अतीत को जानने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह वर्तमान को समझने में भी सशक्त भूमिका निभाती है। उन्होंने जोर देकर कहा कि भारतीय वैज्ञानिक चिंतन और ज्ञान परंपराओं को समझने के लिए संस्कृत अत्यंत सहायक है। प्रो. वारिक के अनुसार, आधुनिक विज्ञान और प्राचीन भारतीय ज्ञान-परंपरा के बीच संवाद स्थापित करके नई पीढ़ी के लिए अनुसंधान के कई नए आयाम विकसित किए जा सकते हैं।
पाणिनी व्याकरण और AI: शोध का उभरता क्षेत्र
“विशेष रूप से पाणिनीय व्याकरण और आधुनिक एआई के बीच संवाद आज शोध का उभरता हुआ क्षेत्र है। 2026 में प्रकाशित शोधों में भी पाणिनीय व्याकरण को भारतीय भाषाओं के कम्प्यूटेशनल प्रसंस्करण के लिए एक संभावित साझा आधार के रूप में देखा गया है।”
एलएनएमयू के रसायनशास्त्र विभाग के सहायक प्राचार्य डॉ. सोनूराम शंकर और सारस्वत अतिथि प्रो. दयानाथ झा ने विषय वस्तु पर विस्तार से व्याख्यान दिया। उन्होंने बताया कि संस्कृत की वैज्ञानिकता उसके सुव्यवस्थित व्याकरण, ध्वनि-विन्यास, शब्द-निर्माण और तर्कपूर्ण वाक्य-विन्यास में स्पष्ट दिखती है। महर्षि पाणिनि द्वारा रचित ‘अष्टाध्यायी’ में लगभग चार हजार सूत्रों के माध्यम से भाषा को अत्यंत व्यवस्थित नियमों में प्रस्तुत किया गया है। यह नियमबद्धता आज कम्प्यूटेशनल लिंग्विस्टिक्स के अध्ययन में विशेष रुचि का विषय बनी हुई है।
उपकुलसचिव डॉ. नवीन कुमार झा ने बताया कि आधुनिक समय में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), प्राकृत भाषा संस्करण (NLP), मशीन अनुवाद, डिजिटल टेक्स्ट विश्लेषण और ज्ञान-प्रतिनिधित्व जैसे क्षेत्रों में संस्कृत के अध्ययन की नई संभावनाएँ उभरी हैं। उन्होंने कहा कि संस्कृत की संधि, समास, रूप-विज्ञान और वाक्य-संरचना को कंप्यूटर द्वारा समझने के लिए पाणिनीय व्याकरण के नियमों का उपयोग करने पर महत्वपूर्ण शोध हो रहा है।
आयुर्वेद से खगोल तक, संस्कृत में छिपा है वैज्ञानिक खजाना
पीआरओ डॉ. निशिकान्त ने जानकारी देते हुए बताया कि लगभग सभी वक्ताओं ने विज्ञान और संस्कृत के बीच संबंधों को अपने-अपने तरीके से समझाया। उन्होंने संस्कृत शास्त्रों में वर्णित वैज्ञानिक तथ्यों को शास्त्र दृष्टि से प्रस्तुत किया। वक्ताओं ने स्पष्ट किया कि संस्कृत और विज्ञान का संबंध केवल ऐतिहासिक गौरव तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आधुनिक ज्ञान-विज्ञान के संदर्भ में भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।
संस्कृत के साथ विज्ञान का संबंध केवल कंप्यूटर विज्ञान तक ही सीमित नहीं है। आयुर्वेद, गणित, ज्योतिष, खगोल, वास्तु, धातुविज्ञान, दर्शन और तर्कशास्त्र जैसे भारतीय ज्ञान-विषयों का विशाल साहित्य संस्कृत में उपलब्ध है। विशेषज्ञों ने इस बात पर जोर दिया कि इस ज्ञान-संपदा को आधुनिक वैज्ञानिक पद्धति, डिजिटल तकनीक और अनुसंधान के साथ जोड़ना आज की आवश्यकता है।
इस संगोष्ठी का संचालन डॉ. अवधेश श्रोत्रिय ने किया, जबकि सत्र का संयोजन डॉ. सविता आर्या ने किया। कार्यक्रम संयोजक साहित्य विभाग के सहायक प्राचार्य डॉ. सुधीर कुमार ने स्वागत भाषण प्रस्तुत किया। इस अवसर पर वित्त पदाधिकारी डॉ. पवन कुमार झा, सीसीसीसी डॉ. शिवलोचन झा, परीक्षा नियंत्रक डॉ. निहार रंजन सिन्हा सहित डॉ. सुनील कुमार झा, डॉ. संतोष पासवान, डॉ. रामसेवक झा, डॉ. शम्भु शरण तिवारी, डॉ. भगलु झा, डॉ. छविलाल न्यौपाने, डॉ. प्रमोद मिश्र, डॉ. वरुण कुमार झा, डॉ. ममता पाण्डेय, डॉ. निशा, डॉ. गोपाल उपाध्याय समेत दर्जनों लोग उपस्थित थे। यह कार्यक्रम संस्कृत के वैज्ञानिक महत्व को रेखांकित करते हुए भविष्य के शोध के लिए प्रेरणा का स्रोत बना।








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