Bihar POCSO Verdict: बिहार के लखीसराय में न्यायिक इतिहास का एक महत्वपूर्ण फैसला सामने आया है। विशेष पॉक्सो अदालत ने 8 वर्षीय नाबालिग बच्ची से दुष्कर्म के मामले में आरोपी 44 वर्षीय गोपाल मिश्रा को अंतिम सांस तक आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। न्यायाधीश श्वेता वर्मा की अदालत ने पीड़िता के पुनर्वास और चिकित्सा जरूरतों को देखते हुए 10.50 लाख रुपये मुआवजा देने का भी आदेश दिया है। इस फैसले को त्वरित न्याय की मिसाल के तौर पर देखा जा रहा है।
सिर्फ तीन महीने में पूरा हुआ ट्रायल
पुलिस द्वारा चार्जशीट दाखिल किए जाने के महज तीन महीने के भीतर न्यायालय ने इस संवेदनशील मामले का ट्रायल पूरा कर फैसला सुनाया। अभियोजन पक्ष ने साक्ष्य प्रस्तुत करने के बाद करीब एक सप्ताह के भीतर सभी गवाहों के बयान दर्ज कराए। मामले की गंभीरता को देखते हुए अदालत ने सुनवाई को प्राथमिकता दी, जिससे न्याय प्रक्रिया में तेजी आई।

दोषी गोपाल मिश्रा को आजीवन कारावास और एक लाख का अर्थदंड
यह मामला मेदनीचौकी थाना कांड संख्या 31/2026 और पॉक्सो केस संख्या 32/2026 से संबंधित है। दोषी गोपाल मिश्रा, मेदनीचौकी थाना क्षेत्र के देवघरा निवासी स्व. रविकांत मिश्रा का पुत्र है। अदालत ने उसे भारतीय न्याय संहिता और पॉक्सो एक्ट की संबंधित धाराओं के तहत दोषी ठहराया। न्यायालय ने उसे प्राकृतिक मृत्यु तक आजीवन कारावास के साथ एक लाख रुपये अर्थदंड की सजा सुनाई। अर्थदंड की राशि की वसूली के बाद इसे पीड़िता के चिकित्सीय खर्च और पुनर्वास में उपयोग करने का निर्देश दिया गया है।
पीड़िता को मिलेगा 10.50 लाख रुपये का मुआवजा
न्यायालय ने बिहार पीड़ित प्रतिकर योजना के तहत पीड़िता को 10.50 लाख रुपये मुआवजा देने का भी आदेश दिया है। यह राशि पीड़िता के उपचार, पुनर्वास और भविष्य की आवश्यकताओं में सहायता के लिए दी जाएगी। अदालत ने इस फैसले के माध्यम से पीड़िता के हित और उसके बेहतर भविष्य को प्राथमिकता दी है।
फॉरेंसिक साक्ष्यों ने मजबूत किया अभियोजन पक्ष
मामले की जांच के दौरान पुलिस ने घटनास्थल से फॉरेंसिक साक्ष्य एकत्र किए और उन्हें वैज्ञानिक जांच के लिए प्रयोगशाला भेजा। फॉरेंसिक रिपोर्ट से मिले वैज्ञानिक निष्कर्षों ने अभियोजन पक्ष के मौखिक साक्ष्यों को मजबूती प्रदान की। वैज्ञानिक साक्ष्यों और गवाहों के बयानों के आधार पर ही अदालत को मामले के निष्कर्ष तक पहुंचने में मदद मिली।
अपर लोक अभियोजक गुप्तेश्वर सिंह ने फैसले पर संतोष व्यक्त करते हुए कहा, ‘यह मामला समयबद्ध पुलिस अनुसंधान, त्वरित चार्जशीट, वैज्ञानिक साक्ष्यों के बेहतर संग्रह और न्यायिक प्रक्रिया की तत्परता का उदाहरण है। इस फैसले से पीड़ित परिवार को न्याय मिला है और गंभीर अपराधों के खिलाफ कड़ा संदेश गया है।’
इस मामले में बचाव पक्ष की ओर से डालसा अधिवक्ता कमलेश कुमार शांडिल्य ने पैरवी की। यह फैसला बिहार में बाल यौन शोषण के खिलाफ न्याय प्रणाली की तत्परता और संवेदनशीलता को दर्शाता है, जिससे भविष्य में ऐसे अपराधों पर अंकुश लगाने में मदद मिलेगी।







