Katihar corruption case: बिहार के कटिहार में एक बड़ा फैसला आया है, जिसने सरकारी कार्यालयों में भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त संदेश दिया है। कटिहार के तत्कालीन डीसीएलआर कार्यालय के पेशकार वीरेंद्र कुमार श्रीवास्तव उर्फ वीरेंद्र कुमार सिन्हा को रिश्वत लेने के एक पुराने मामले में अदालत ने दोषी करार दिया है। उन्हें 3 साल के सश्रम कारावास और 12,000 रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई गई है। यह मामला लगभग 14 साल पुराना है, जिस पर 12 अक्टूबर 2026 को फैसला सुनाया गया।
अदालत ने वीरेंद्र कुमार सिन्हा को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7 के तहत तीन साल के सश्रम कारावास और 6,000 रुपये जुर्माने का आदेश दिया है। इसके अतिरिक्त, इसी अधिनियम की धारा 13(2) के तहत दो साल का सश्रम कारावास और 6,000 रुपये का अतिरिक्त जुर्माना लगाया गया है। जुर्माना नहीं देने की स्थिति में दोषी को दो महीने की अतिरिक्त साधारण कैद भुगतनी होगी। इस फैसले की जानकारी भागलपुर के मुख्य अभियोजक और आर्थिक अपराध इकाई के विशेष लोक अभियोजक राम बदन कुमार चौधरी के बयान से सामने आई है।
रिश्वत की मांग और आर्थिक अपराध इकाई की कार्रवाई
यह पूरा मामला वर्ष 2012 का है। कटिहार निवासी मनोज कुमार सिंह का एक प्रकरण तत्कालीन भूमि सुधार उप समाहर्ता (डीसीएलआर) डोमन राम के कार्यालय में लंबित था। आरोप था कि इस मामले में अंतिम आदेश पारित कराने के लिए डीसीएलआर के पेशकार वीरेंद्र कुमार श्रीवास्तव उर्फ वीरेंद्र कुमार सिन्हा ने मनोज कुमार सिंह से 60,000 रुपये की रिश्वत मांगी थी। मांगी गई रकम में 50,000 रुपये डीसीएलआर के लिए और 10,000 रुपये पेशकार के हिस्से के रूप में तय किए गए थे।
रिश्वत की इस मांग से परेशान होकर मनोज कुमार सिंह ने आर्थिक अपराध इकाई के एसपी से शिकायत की। शिकायत मिलने के बाद आर्थिक अपराध इकाई ने मामले की जांच और सत्यापन की प्रक्रिया शुरू की। 6 जुलाई 2012 को रिश्वत मांगने से संबंधित आरोपों का सत्यापन किया गया। इस दौरान पेशकार वीरेंद्र कुमार सिन्हा ने कथित तौर पर ‘फैसला लिखने के लिए 6,000 रुपये अग्रिम देने और शेष रकम हस्ताक्षर के समय देने की बात कही’ थी।
रंगे हाथों गिरफ्तारी और न्यायिक प्रक्रिया
सत्यापन के बाद, आर्थिक अपराध इकाई ने आरोपी को रंगे हाथों पकड़ने की योजना बनाई और एक टीम गठित की गई। नवगछिया से पहुंची आर्थिक अपराध इकाई की टीम ने कटिहार स्थित डीसीएलआर कार्यालय में छापेमारी की। इस कार्रवाई के दौरान पेशकार वीरेंद्र कुमार सिन्हा को कथित तौर पर 6,000 रुपये की रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों गिरफ्तार कर लिया गया।
मामले के विवरण के अनुसार, उस समय तत्कालीन डीसीएलआर डोमन राम मौके से भाग गए थे, जिसके बाद उनके खिलाफ भी प्राथमिकी दर्ज की गई थी। हालांकि, यह मौजूदा सजा पेशकार वीरेंद्र कुमार सिन्हा के विरुद्ध सुनाए गए फैसले से जुड़ी है। इस मामले की सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष की ओर से कुल 17 गवाह पेश किए गए। वर्ष 2012 में हुई कार्रवाई के बाद मामला न्यायिक प्रक्रिया से गुजरा और लगभग तीन साल तक चली बहस के बाद अदालत ने 12 अक्टूबर 2026 को अपना फैसला सुनाया।
भ्रष्टाचार पर अदालत का कड़ा संदेश
कटिहार का यह मामला सरकारी कार्यालय में लंबित प्रकरण का अंतिम आदेश जारी कराने के बदले रिश्वत मांगने के आरोप से जुड़ा था। शिकायतकर्ता की ओर से आर्थिक अपराध इकाई से संपर्क किए जाने के बाद सत्यापन और छापेमारी की कार्रवाई हुई थी, जिसके बाद गिरफ्तारी, प्राथमिकी और अदालत में सुनवाई की लंबी प्रक्रिया चली।
लगभग 14 साल पुराने इस मामले में अदालत का फैसला भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों की न्यायिक प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। अदालत ने स्पष्ट संदेश दिया है कि सरकारी कामकाज में रिश्वतखोरी बर्दाश्त नहीं की जाएगी और दोषी को कड़ी सजा मिलेगी। हालांकि, तत्कालीन डीसीएलआर डोमन राम के विरुद्ध दर्ज प्राथमिकी की वर्तमान स्थिति के संबंध में उपलब्ध विवरण में अलग से कोई जानकारी नहीं दी गई है।







