Bihar High Court: बिहार में यौन अपराधों को लेकर एक अहम फैसले में पटना हाईकोर्ट ने दुष्कर्म के प्रयास और महिला की लज्जा भंग करने के बीच कानूनी अंतर को स्पष्ट किया है। बेगूसराय के वर्ष 2010 के एक मामले में कोर्ट ने कहा कि महिला के घर में घुसकर उसके बिस्तर पर लेटना और चीख रोकने के लिए मुंह दबाना गंभीर कृत्य है, लेकिन यह अपने आप में दुष्कर्म का प्रयास साबित नहीं होता। न्यायमूर्ति संदीप कुमार की एकलपीठ ने आरोपी मो. ऐनुल हक को दुष्कर्म के प्रयास के आरोप से बरी करते हुए चार साल की सजा रद्द कर दी, हालांकि अन्य अपराधों में दोषसिद्धि बरकरार रखी।
पटना हाईकोर्ट का बड़ा झटका! क्या हर छेड़छाड़ दुष्कर्म का प्रयास नहीं? कोर्ट ने सुनाया ऐतिहासिक फैसला
Bihar High Court: पटना हाईकोर्ट ने दुष्कर्म के प्रयास और छेड़छाड़ जैसे गंभीर अपराधों के बीच एक महत्वपूर्ण कानूनी अंतर स्पष्ट किया है। बेगूसराय के वर्ष 2010 के एक मामले में सुनवाई करते हुए अदालत ने साफ किया कि महिला के घर में घुसना, दीया बुझाना, उस पर लेटना या चीखने से रोकने के लिए मुंह दबाना जैसी हरकतें आपत्तिजनक हैं, लेकिन दुष्कर्म का प्रयास साबित करने के लिए शारीरिक संबंध बनाने की दिशा में आरोपी के ठोस कदम उठाने के सबूत होने चाहिए। इस फैसले से कानूनी व्याख्या को लेकर चल रही बहस पर विराम लगा है।
जस्टिस संदीप कुमार की एकल पीठ ने मोहम्मद ऐनुल हक को दुष्कर्म के प्रयास के आरोप से बरी कर दिया। अदालत ने इस आरोप में मिली चार साल की सजा को रद्द कर दिया। हालांकि, महिला की लज्जा भंग करने और घर में जबरन प्रवेश करने के अपराधों में उसकी सजा पूरी तरह समाप्त नहीं की गई। अदालत ने ऐनुल हक की सजा को जेल में बिताई गई लगभग ढाई महीने की अवधि तक सीमित कर दिया।
अदालत के सामने पेश किए गए सबूतों से दुष्कर्म के प्रयास का आरोप पर्याप्त रूप से साबित नहीं हो सका। पीड़िता के बयान के अनुसार, घटना के दौरान न उसके कपड़े फटे थे और न ही आरोपी के कपड़ों में कोई क्षति हुई थी। कपड़े उतारने या शरीर पर चोट लगने के भी कोई साक्ष्य नहीं मिले। इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए अदालत ने दुष्कर्म के प्रयास के आरोप को बरकरार रखने का पर्याप्त आधार नहीं पाया।
कोर्ट ने क्या कहा, क्या है कानूनी अंतर?
पटना हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी महिला के साथ अश्लील हरकत करना, उसे जबरन पकड़ना या उसकी गरिमा को ठेस पहुंचाना अपने आप में गंभीर अपराध हो सकते हैं। लेकिन, हर ऐसी घटना को दुष्कर्म का प्रयास नहीं माना जा सकता। इसके लिए घटना की परिस्थितियों और आरोपी के कृत्यों की कानूनी कसौटी पर जांच बेहद जरूरी है। अदालत ने भारतीय दंड संहिता की धारा 354 के तहत महिला की लज्जा भंग करने से जुड़े अपराध को भी ध्यान में रखा। इस प्रावधान के तहत महिला पर हमला करना या आपराधिक बल का इस्तेमाल करना, जब उसका उद्देश्य उसकी लज्जा भंग करना हो, तो वह दंडनीय अपराध है। इस मामले में कोर्ट ने पीड़िता को 25 हजार रुपये मुआवजा देने का निर्देश दिया, जबकि आरोपी पर 25 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया गया।
जब सुप्रीम कोर्ट ने पटना हाईकोर्ट के फैसले पर जताई थी आपत्ति
यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि इससे पहले भी पटना हाईकोर्ट के एक फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया था। उस समय हाईकोर्ट ने अपने आदेश में टिप्पणी की थी कि महिला के सलवार उतारने की कोशिश और सीना दबाना दुष्कर्म का प्रयास नहीं है। इस मामले की सुनवाई CJI सूर्यकांत, जस्टिस जॉपमाल्या बागची और जस्टिस बी मोहना की बेंच ने की थी। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने तब कहा था कि पटना हाईकोर्ट के आदेश में की गई टिप्पणियां आपत्तिजनक हैं। पटना हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस पूर्णेन्दु सिंह ने 9 जुलाई को यह फैसला सुनाया था। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ किया था कि आरोपी का पक्ष सुनने के बाद इस फैसले को खारिज भी किया जा सकता है। CJI सूर्यकांत ने बिहार के एडवोकेट जनरल एसडी संजय को स्थानीय पुलिस के जरिए आरोपी को नोटिस तामील कराने का निर्देश दिया था।
पटना हाईकोर्ट का यह नवीनतम फैसला दुष्कर्म के प्रयास जैसे गंभीर मामलों में कानूनी स्पष्टता प्रदान करता है। यह निर्धारित करता है कि अपराध की गंभीरता को आंकने के लिए सिर्फ आपत्तिजनक हरकतें ही नहीं, बल्कि आरोपी के इरादे और शारीरिक संबंध स्थापित करने के ठोस प्रयासों को भी देखा जाना चाहिए, जबकि महिला की गरिमा भंग करने के अपराधों पर भी सख्त रुख अपनाया गया है।
दुष्कर्म के प्रयास और छेड़छाड़ में क्या है कानूनी अंतर?
अदालत ने अपनी व्याख्या में स्पष्ट किया कि दुष्कर्म के प्रयास के आरोप को साबित करने के लिए केवल गलत नीयत या अश्लील हरकतें पर्याप्त नहीं मानी जा सकतीं। इसके लिए यह सिद्ध करना अनिवार्य है कि आरोपी ने पीड़िता के साथ शारीरिक संबंध बनाने की दिशा में कोई ठोस कदम उठाया था। इस मामले में, अदालत के सामने पेश तथ्यों के मुताबिक, आरोपी मो. ऐनुल हक ने महिला के घर में प्रवेश कर उसके साथ जबरदस्ती की थी, लेकिन शारीरिक संबंध बनाने का प्रत्यक्ष प्रयास साबित नहीं हो सका।
पटना हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि गलत नीयत से किसी महिला पर हमला करना या उसके साथ अश्लील हरकत करना अपने आप में दुष्कर्म का प्रयास साबित नहीं करता। इसके लिए यह देखना जरूरी है कि आरोपी ने अपराध की तैयारी से आगे बढ़कर शारीरिक संबंध बनाने की दिशा में कोई ठोस कदम उठाया था या नहीं।
इसी आधार पर कोर्ट ने दुष्कर्म के प्रयास के आरोप में पहले मिली चार साल की सजा को रद्द कर दिया। हालांकि, अदालत ने आरोपी की हरकतों को सामान्य नहीं माना। महिला के बिस्तर पर लेटना और उसकी चीख रोकने के लिए मुंह दबाना उसकी गरिमा और लज्जा को ठेस पहुंचाने वाला कृत्य माना गया। इसलिए भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 354 के तहत दोष बरकरार रखा गया।
कोर्ट ने क्यों रद्द की दुष्कर्म के प्रयास की सजा?
हाईकोर्ट के सामने मामले में यह भी तथ्य आया कि पीड़िता और आरोपी के कपड़े नहीं फटे थे। कपड़े उतारने या शरीर पर चोट के निशान से जुड़े साक्ष्य भी नहीं मिले। अदालत के अनुसार, दुष्कर्म के प्रयास का आरोप साबित करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य नहीं थे। कोर्ट ने इन तथ्यों के साथ उपलब्ध साक्ष्यों का गहन आकलन किया, जिसके बाद आरोपी को इस आरोप से बरी किया गया।
अपनी कानूनी व्याख्या में हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का भी हवाला दिया। इन फैसलों के आधार पर यह स्पष्ट किया गया कि अश्लील हमला या छेड़छाड़ और दुष्कर्म का प्रयास कानूनी रूप से अलग अपराध हैं। दुष्कर्म के प्रयास के लिए आरोपी की हरकतों और अपराध की दिशा में उठाए गए कदमों का आकलन करना जरूरी है।
पीड़िता को मिलेगा मुआवजा, आरोपी की सजा ढाई महीने तक सीमित
मो. ऐनुल हक को दुष्कर्म के प्रयास के आरोप से राहत मिलने के बावजूद, महिला की लज्जा भंग करने और घर में अनधिकृत प्रवेश से जुड़े अपराधों में उसकी दोषसिद्धि बरकरार रही। इन अपराधों में उसकी सजा को जेल में बिताई गई अवधि तक सीमित कर दिया गया, जो करीब ढाई महीने बताई गई है। इसके साथ ही, कोर्ट ने पीड़िता को 25 हजार रुपये का मुआवजा देने का भी आदेश दिया। यह फैसला इस बात पर केंद्रित था कि उपलब्ध साक्ष्य दुष्कर्म के प्रयास का आरोप साबित करने के लिए पर्याप्त थे या नहीं।
इस मामले के अलावा, पटना हाईकोर्ट के एक अन्य फैसले में महिला की सलवार उतारने की कोशिश और सीना दबाने से जुड़ी टिप्पणियों पर सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया था। उस मामले में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने हाईकोर्ट की टिप्पणियों को आपत्तिजनक बताया था। सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी का पक्ष सुनने के बाद उस फैसले को रद्द करने पर विचार करने की बात कही थी और बिहार के एडवोकेट जनरल के माध्यम से कार्रवाई का निर्देश दिया था। हालांकि, यह मामला बेगूसराय के वर्ष 2010 वाले केस से बिल्कुल अलग है।







