दरभंगा के मुफ्ती आमिर मजहरी ने बताया…ये होती है ईद
जाले,देशज टाइम्स ब्यूरो। ईद का त्यौहार समाज के अंदर खुशियां फैलाना पड़ोसियों के साथ सुख-दु:ख में भागीदार बनना और जन-जन के बीच सौहार्द फैलाना एक अहम भूमिका अदा करता है।
यह कहना है मुफ्ती अमिर मज़हरी कासमी संचालक, मदरसा दारूल उलूम जाले का। देशज टाइम्स से खास बातचीत करते हुए मुफ्ती,आमिर मजहरी ने कहा, इस्लाम धर्म के मान्यताओं के अनुसार रमजान का पवित्र महीना अपने आप पर नियंत्रण व संयम रखने का एक इम्तिहान होता है।
पूरा दिन रोजा रखना, अपनी भूख और प्यास को कुर्बान करना। यह अपने-आप पर संयम रखने का एक तरीका माना जाता है। इसका एक कारण यह है कि आप गरीबों के दु:ख और दर्द को समझ सकें। उनकी मदद कर सकें, और उनके प्रति संवेदनशीलता बन सकें।
रमजान के महीने में सिर्फ गर्मी-ठंड-बरसात से ही संयम नहीं बढ़ता। रमजान में अपने आंख-कान-नाक और जुबान को नियंत्रण में रखना ही रोजा कहलाता है।
रमजान के महीना में रोजेदारों को ना तो बुरा सुनना है ना बुरा बोलना और ना तो बुरा देखना व ना तो बुरा एहसास करना है। इस प्रकार रमजान का पवित्र महीना धार्मिक श्रद्धा के अलावा बुरी आदतों को छुड़ाने का भी काम करता है।कहा जाता है कि इस महीने में जितनी हो सकते उतनी गरीबों की मदद करनी चाहिए।
वास्तव में देखा जाए तो ईद का त्यौहार समाज के अंदर खुशियां फैलाना, पड़ोसियों के साथ सुख-दु:ख में भागीदार बनना और जन-जन के बीच सौहार्द फैलाना एक अहम भूमिका अदा करता है। रमजान का महीना विशेष धार्मिक महत्व का होता है।
मुसलमानों के लिए उनके दृष्टिकोण के अनुसार आत्म सिद्धि का महीना होता है। इस महीने के दौरान सभी मुसलमान पूरे दिन का उपवास रखते हैं। इतनी कठोरता से पालन करते हैं कि वह पूरे दिन में जल के एक बूंद भी ग्रहण नहीं कर सकते हैं। रमजान को आध्यात्मिक रूप से पवित्र होने के तरीके के तौर पर भी देखा जाता है।
इस दौरान संयमित और अनुशासित व्यवहार करने के लिए प्रेरित किया जाता है। रोजा रखने का मकसद मुसलमानों को यह याद दिलाना भी है कि गरीबों और जरूरतमंदों के प्रति दयाभाव रखना और उनकी मदद करना कितना जरूरी है।