Bihar hiring policy: बेंगलुरु की एक स्टार्टअप कंपनी A1 स्पोर्ट्स वर्ल्ड के सीईओ कार्तिक एसजी के एक फैसले ने देशव्यापी बहस छेड़ दी है। उन्होंने घोषणा की है कि उनकी कंपनी अब उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान और मध्य प्रदेश के पुरुष उम्मीदवारों को नौकरी पर नहीं रखेगी। इस फैसले के पीछे कार्यस्थल में एक कथित दुर्व्यवहार का हवाला दिया गया है, लेकिन सवाल यह उठ रहा है कि क्या एक व्यक्ति के कथित गलत व्यवहार के आधार पर पूरे राज्यों के लाखों उम्मीदवारों को हायरिंग प्रक्रिया से बाहर करना उचित है? यह मामला अब सिर्फ एक कंपनी की एचआर पॉलिसी नहीं, बल्कि नौकरी, क्षेत्रीय पहचान, कार्यस्थल सुरक्षा और संवैधानिक अधिकारों जैसे कई गंभीर मुद्दों पर चर्चा का केंद्र बन गया है।
पूरा मामला क्या है और क्यों आया विवाद?
A1 स्पोर्ट्स वर्ल्ड के सीईओ कार्तिक एसजी ने सोशल मीडिया पर बताया कि उनकी कंपनी के एक कर्मचारी को महिला सहकर्मियों के साथ कथित अनुचित व्यवहार के लिए दो बार चेतावनी दी गई थी। इसके बाद उस कर्मचारी पर एक महिला सहकर्मी के साथ जबरदस्ती करने की कोशिश का आरोप लगा, जिसके बाद कंपनी ने उसे नौकरी से निकाल दिया। इस घटना के बाद सीईओ ने अपनी हायरिंग पॉलिसी में बदलाव की बात कही, जिसके तहत उन्होंने इन चार राज्यों के पुरुष उम्मीदवारों को हायर न करने का फैसला किया।

विवाद कर्मचारी को निकालने पर नहीं, बल्कि पूरे राज्यों के उम्मीदवारों को एक साथ बाहर करने पर खड़ा हुआ है। सवाल यह है कि एक व्यक्ति का आचरण उसकी व्यक्तिगत जिम्मेदारी है या उसके राज्य की पहचान से जुड़ा है?
क्या निजी कंपनियां मनमानी कर सकती हैं? संविधान और कानून क्या कहते हैं?
इस विवाद के बाद भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15 और 16 का जिक्र खूब हो रहा है। अनुच्छेद 15 राज्य को नागरिकों के साथ धर्म, नस्ल, जाति, लिंग और जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव करने से रोकता है। वहीं, अनुच्छेद 16 सार्वजनिक रोजगार में समान अवसर से संबंधित है। हालांकि, A1 स्पोर्ट्स वर्ल्ड जैसी निजी कंपनियों पर ये संवैधानिक प्रावधान सीधे तौर पर उस तरह लागू नहीं होते, जैसे सरकारी नौकरियों के मामले में होते हैं। निजी कंपनियों पर अनुच्छेद 15 और 16 की वही संवैधानिक बाध्यता नहीं होती जो राज्य पर होती है।
लेकिन, इसका मतलब यह भी नहीं कि कोई भी हायरिंग क्राइटेरिया अपने आप में निष्पक्ष या उचित हो जाता है। ‘हर इकोनॉमी’ की संस्थापक और निदेशक प्रिशा सिंह के अनुसार, केवल जन्मस्थान के आधार पर उम्मीदवार को व्यक्तिगत मूल्यांकन के बिना बाहर करना एक मनमाना मापदंड माना जा सकता है।
कार्यस्थल पर सुरक्षा जरूरी, पर तरीका क्या हो? विशेषज्ञों की राय
कार्यस्थल पर महिलाओं की सुरक्षा एक गंभीर चिंता का विषय है, जिसे सीईओ कार्तिक एसजी ने अपने फैसले का आधार बताया है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि सुरक्षा सुनिश्चित करने के तरीके पर बहस होनी चाहिए। प्रिशा सिंह का कहना है कि सीईओ की सुरक्षित कार्यस्थल बनाने की मूल चिंता समझ में आती है, लेकिन एक व्यक्ति के कथित दुर्व्यवहार को चार राज्यों के पुरुष उम्मीदवारों पर लागू करना गलत है। इससे कंपनी अच्छे उम्मीदवारों को भी खो सकती है और क्षेत्रीय भेदभाव की धारणा पैदा होगी।
प्रिशा सिंह सुझाव देती हैं कि कंपनियों को उम्मीदवार की भौगोलिक पहचान के बजाय उसके व्यवहार और पेशेवर आचरण का आकलन करना चाहिए। इसके लिए कई राउंड में इंटरव्यू, बिहेवियरल असेसमेंट, साइकोलॉजिकल असेसमेंट, सिचुएशनल जजमेंट टेस्ट (SJT) और मजबूत बैकग्राउंड वेरिफिकेशन जैसे तरीके अपनाए जा सकते हैं।
बीजेपी झारखंड के प्रवक्ता मृत्युंजय शर्मा ने भी व्यक्तिगत जवाबदेही पर जोर दिया है। उनके अनुसार, किसी कर्मचारी का मूल्यांकन उसकी योग्यता और व्यवहार के आधार पर होना चाहिए, न कि उसके राज्य के आधार पर। जियोस्टेट.ऑर्ग की निदेशक प्रियांशी त्रिपाठी भी कार्यस्थल सुरक्षा की चिंता को स्वीकार करती हैं, लेकिन उनका सवाल है कि क्या किसी व्यक्ति का जन्मस्थान उसकी क्षमता या चरित्र का विश्वसनीय पैमाना हो सकता है? वह बेहतर स्क्रीनिंग, मजबूत जवाबदेही और सशक्त कार्यस्थल नीति की वकालत करती हैं।
यह भी महत्वपूर्ण है कि कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न की रोकथाम के लिए POSH एक्ट, 2013 पहले से मौजूद है। यह कानून शिकायत दर्ज करने और दोषी पाए जाने पर कार्रवाई के लिए एक संस्थागत तंत्र प्रदान करता है। यानी कार्यस्थल सुरक्षा का पहला जवाब मजबूत आंतरिक सुरक्षा उपाय और जवाबदेही होनी चाहिए।
बेंगलुरु के इस फैसले ने भारतीय कार्यस्थलों के सामने एक जटिल सवाल खड़ा कर दिया है। क्या किसी कर्मचारी के गलत व्यवहार का जवाब केवल उस कर्मचारी के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए, या उसके जैसे भौगोलिक पृष्ठभूमि वाले अन्य लोगों को भी हायरिंग से बाहर कर देना चाहिए? भारत जैसे देश में, जहां शिक्षा और रोजगार के लिए लोग लगातार एक राज्य से दूसरे राज्य जाते हैं, यह बहस केवल बेंगलुरु की नहीं है। यह उस बड़े सवाल की भी है कि हम नौकरी के लिए किसी व्यक्ति को कैसे परखते हैं—उसके पते से, या उसके काम और व्यवहार से? इस मामले ने क्षेत्रीय पहचान बनाम व्यक्तिगत आचरण के बीच की रेखा को और गहरा कर दिया है, जिस पर आगे भी चर्चा जारी रहेगी।


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