Bihar Liquor Ban: बिहार में शराबबंदी नीति लागू होने के बाद से राज्य में हजारों लोगों पर सख्त कार्रवाई की गई है। सड़कों, मोहल्लों और घरों तक पुलिस तथा उत्पाद विभाग की टीमें ब्रेथ एनालाइजर मशीन के साथ घूमती रही हैं और संदिग्धों को तुरंत गिरफ्तार करती रही हैं। हालांकि, अब बिहार में पटना हाईकोर्ट की एक महत्वपूर्ण टिप्पणी ने इस पूरी प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा है कि केवल ब्रेथ एनालाइजर रिपोर्ट के आधार पर किसी व्यक्ति को शराब पीने का दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
पटना हाईकोर्ट ने अपने एक अहम फैसले में कहा है, “ब्रेथ एनालाइजर रिपोर्ट को अंतिम प्रमाण (conclusive proof) नहीं माना जा सकता। सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों को नजरअंदाज कर सिर्फ इसी आधार पर एफआईआर दर्ज करना गलत है।”
🔥 आज की सबसे ज्यादा पढ़ी गई खबरें1मुजफ्फरपुर में भोपाल पुलिस का चौंकाने वाला खुलासा! इंजीनियर का छपरा में चलता था ‘ATM लूट का ट्रेनिंग कैंप’, पढ़िए – कैसे पकड़ा गया मास्टरमाइंड!2समस्तीपुर RPF की बड़ी चूक: हवालात से शराब तस्कर फरार, विभाग ने लिया एक्शन, 4 पुलिसकर्मी सस्पेंड!3Vietnam Boat Accident वियतनाम में बड़ा हादसा: नाव पलटने से 15 भारतीयों की दर्दनाक मौत, 21 बचे सुरक्षित4बड़ी खबर! बिहार में अब 75 साल से ऊपर के बुजुर्ग घर बैठे करा सकेंगे अपनी जमीन की रजिस्ट्री, CM सम्राट ने किया ऐलान5बांका में ‘हाफ एनकाउंटर’ पर बवाल-बड़ा खुलासा! पिता का आया चौंकाने वाला बयान- रांची से गिरफ्तारी, फिर जंगल में कैसे मारी पैर में गोली?6बिहार को मिलेगी बड़ी सौगात! 160 KM/H की रफ्तार से दौड़ेगी रैपिड रेल, बदल जाएगी पटना, मुजफ्फरपुर, बेगूसराय, आरा, गया की तस्वीर
ब्रेथ एनालाइजर रिपोर्ट पर हाईकोर्ट का रुख
पटना हाईकोर्ट के विभिन्न बेंचों, जिनमें जस्टिस बिबेक चौधरी और जस्टिस आलोक कुमार पांडे जैसे न्यायाधीश शामिल हैं, ने हाल के कई फैसलों में यह बात दोहराई है। इन फैसलों में यह स्पष्ट किया गया है कि ब्रेथ एनालाइजर मशीन केवल एक प्रारंभिक जांच का माध्यम है। शराब के सेवन की पुष्टि के लिए इस रिपोर्ट को वैज्ञानिक और ठोस साक्ष्य नहीं माना जा सकता है। अदालत के अनुसार, शराब की खपत की पुष्टि के लिए रक्त (ब्लड) या मूत्र (यूरिन) परीक्षण अनिवार्य है।
अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि सांस की दुर्गंध, लड़खड़ाना या मशीन की कोई रीडिंग अकेले पर्याप्त सबूत नहीं हैं। कई मामलों में, हाईकोर्ट ने केवल ब्रेथ एनालाइजर रिपोर्ट के आधार पर दर्ज की गई एफआईआर को रद्द कर दिया है, यह बताते हुए कि यह सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों का उल्लंघन है।
क्या कहता है कानून और क्यों उठे सवाल?
वर्ष 2016 में बिहार में पूर्ण शराबबंदी लागू होने के बाद बिहार मद्य निषेध एवं उत्पाद शुल्क अधिनियम के तहत कड़े प्रावधान किए गए थे। राज्य सरकार का दावा है कि इस नीति के कारण अपराध दर में कमी आई है, लेकिन आलोचकों का कहना है कि इसके क्रियान्वयन में अत्यधिक उत्साह और कई बार दुरुपयोग भी हुआ है। पुलिस और उत्पाद विभाग की टीमें अक्सर बिना वारंट के घरों में घुसकर या सड़क पर लोगों को रोककर ब्रेथ एनालाइजर टेस्ट करती रही हैं। इसी मशीन के आधार पर सैकड़ों मामले कोर्ट तक पहुंचे हैं, जिसमें हजारों लोग गिरफ्तार हुए हैं।
शराबबंदी पर अब आगे क्या?
पटना हाईकोर्ट के इस फैसले का बिहार में शराबबंदी कानून के तहत चल रहे और भविष्य के मामलों पर गहरा असर पड़ेगा। अब पुलिस और उत्पाद विभाग को शराब पीने के आरोप में गिरफ्तारी के लिए केवल ब्रेथ एनालाइजर रिपोर्ट से आगे बढ़कर वैज्ञानिक साक्ष्य जुटाने होंगे। इससे न केवल हजारों विचाराधीन मामलों की स्थिति बदलेगी, बल्कि प्रवर्तन एजेंसियों को अपनी जांच प्रक्रियाओं में भी महत्वपूर्ण बदलाव करने होंगे। यह फैसला उन लोगों के लिए भी राहत लेकर आया है, जिन्हें सिर्फ मशीन की रीडिंग के आधार पर गिरफ्तार किया गया था।












