भारतीय रुपया: पिछले कुछ समय से भारतीय रुपये में जारी उठापटक ने निवेशकों और नीति निर्माताओं की चिंताएं बढ़ा दी हैं। जहां एक ओर अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपये ने अपने सर्वकालिक निचले स्तर को छुआ, वहीं दूसरी ओर उसने तेजी से वापसी करते हुए निवेशकों को थोड़ा सुकून भी दिया। क्या यह सिर्फ अस्थायी सुधार है या रुपये की चाल में कोई बड़ा बदलाव आने वाला है, आइए जानते हैं।
अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया: आखिर क्यों आई इतनी बड़ी गिरावट और फिर वापसी?
हालिया समय में भारतीय रुपये में आई तेज गिरावट ने बाजार में नई बहस छेड़ दी है। अमेरिका के साथ व्यापार समझौते को लेकर चल रही लंबी बातचीत और यूरोपीय संघ के साथ मुक्त व्यापार समझौते की उम्मीदों के बीच भी, गुरुवार को रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले अपने सर्वकालिक निचले स्तर 91.99 पर पहुँच गया। हालांकि, इसी दिन बाजार बंद होने तक रुपये में 9 पैसे की मजबूती दर्ज की गई और यह तेजी से वापसी करता दिखा।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में नरमी के संकेत मिलने के बाद शुक्रवार को शुरुआती कारोबार में भारतीय रुपया अपने ऐतिहासिक निचले स्तर से उबरता दिखा। शुरुआती कारोबार में अमेरिकी डॉलर के मुकाबले यह 9 पैसे मजबूत होकर 91.90 के स्तर पर पहुँच गया। यह सुधार बाजार के लिए एक सकारात्मक संकेत माना जा रहा है।
भारतीय रुपया: उतार-चढ़ाव के बीच क्या कहते हैं विशेषज्ञ?
विदेशी मुद्रा कारोबारियों के अनुसार, रुपये में आई यह शुरुआती तेजी मजबूत डॉलर इंडेक्स और विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) द्वारा लगातार की जा रही निकासी के कारण सीमित रही। अंतरबैंक विदेशी मुद्रा विनिमय बाजार में रुपया 91.89 पर खुला और शुरुआती कारोबार में डॉलर के मुकाबले 91.87 तक मजबूत होने के बाद 91.90 पर कारोबार करता देखा गया। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। इस तरह, रुपये ने अपने पिछले बंद भाव की तुलना में 9 पैसे की बढ़त दर्ज की। इससे पहले गुरुवार को रुपया डॉलर के मुकाबले 91.99 के अपने अब तक के सबसे निचले स्तर पर बंद हुआ था।
चॉइस वेल्थ के रिसर्च एंड प्रोडक्ट चीफ, अक्षत गर्ग ने इस स्थिति पर अपनी राय व्यक्त करते हुए कहा कि डॉलर की लगातार मजबूती, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी और विदेशी निवेशकों की पूंजी निकासी ने मिलकर उभरते बाजारों की मुद्राओं पर भारी दबाव बनाए रखा है, और भारतीय रुपया भी इस वैश्विक दबाव से अछूता नहीं है। आयातकों की महीने के अंत में बढ़ी हुई डॉलर मांग और एहतियाती हेजिंग ने रुपये पर दबाव को और बढ़ा दिया है। हालांकि, भारतीय रिज़र्व बैंक के पास बाजार में अत्यधिक अस्थिरता को नियंत्रित करने के लिए पर्याप्त संसाधन मौजूद हैं, लेकिन अव्यवस्थित बाजार स्थितियां न बनने तक किसी विशेष स्तर का आक्रामक रूप से बचाव किए जाने की संभावना कम है।
रियल-टाइम बिजनेस – टेक्नोलॉजी खबरों के लिए यहां क्लिक करें: https://deshajtimes.com/news/business/
बाजार पर वैश्विक संकेतों का असर
इससे पहले, 23 जनवरी को भी भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 92 के स्तर तक फिसलकर अपने रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया था। इस दौरान, छह प्रमुख मुद्राओं के मुकाबले डॉलर की मजबूती को दर्शाने वाला डॉलर इंडेक्स 0.36 प्रतिशत की बढ़त के साथ 96.48 पर बना हुआ था, जो रुपये पर दबाव का एक प्रमुख कारण था। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।
वैश्विक तेल बाजार की बात करें तो ब्रेंट क्रूड वायदा कीमतों में 1.50 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई और यह 69.62 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार करता दिखा। कच्चे तेल की कीमतों में यह नरमी रुपये के लिए एक सकारात्मक संकेत है क्योंकि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर करता है। विदेशी मुद्रा बाजार में यह एक महत्वपूर्ण कारक है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।







