Bihar Durga Puja: भागलपुर के सन्हौला से आशीष कुमार की रिपोर्ट । भागलपुर जिले का पोठिया गांव अपनी अनोखी दुर्गा पूजा परंपरा के लिए सुर्खियों में है। यहां श्री श्री 1008 मां दुर्गा मंदिर में मिट्टी की बजाय पत्तों, बेल और हल्दी के पौधों से मां की प्रतिमा तैयार की जाती है। इस मंदिर से एक सदियों पुरानी लोककथा जुड़ी है, जिसके चलते यहां की महिलाएं घुंघरू वाली पायल नहीं पहनतीं।
अनोखी प्रतिमा निर्माण और घुंघरू वाली पायल की परंपरा
सन्हौला प्रखंड के पोठिया गांव में स्थित श्री श्री 1008 मां दुर्गा मंदिर की परंपरा अद्भुत है। यहां मां दुर्गा की प्रतिमा मिट्टी से नहीं, बल्कि विशेष रूप से तैयार किए गए पत्तों, मोनि पत्ता, बेल और हल्दी के पौधों से बनाई जाती है। मां की आंखें भी बेल से ही तैयार होती हैं, जो इस
प्रतिमा को एक अनूठा और प्राकृतिक स्वरूप देती हैं। इस मंदिर में पूजा के दौरान एक और विशिष्ट नियम का पालन किया जाता है: महिलाएं घुंघरू वाली पायल नहीं पहनतीं। सप्तमी के दिन प्रतिमा मंदिर में प्रवेश करती है, जिसके बाद गांव के बुजुर्ग और युवा मिलकर मां का शृंगार करते हैं। महिलाएं खोइछा भरकर अपनी आस्था व्यक्त करती हैं।
अंग्रेजों के दौर से पहले की पूजा और रहस्यमयी लोककथा
ग्रामीणों का दावा है कि पोठिया में यह पूजा अंग्रेजों के शासनकाल से भी पहले से होती आ रही है, हालांकि इस दावे का कोई लिखित ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है। बुजुर्गों के अनुसार, एक बार घुंघरू पहनकर सजी-धजी एक लड़की मंदिर में पूजा करने आई थी, लेकिन वह अचानक लापता हो गई। उसकी तलाश के दौरान, मां की प्रतिमा के मुख के पास उसका आंचल या चुनरी दिखने की बात कही जाती है। ग्रामीण इस घटना को प्राकृतिक सामग्रियों से प्रतिमा बनाने और महिलाओं के घुंघरू वाली पायल न पहनने की परंपरा से जोड़ते हैं। इस लोककथा की स्वतंत्र ऐतिहासिक पुष्टि नहीं हुई है, फिर भी यह गांव की सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
सामूहिक सहयोग से भव्य मंदिर का निर्माण
इस मंदिर का सफर मिट्टी की दीवारों वाले एक साधारण ढांचे से शुरू हुआ था। ग्रामीणों के मुताबिक, शुरुआत में गांव के लोगों ने मिलकर पूजा शुरू की और अपनी क्षमता के अनुसार निर्माण कार्य में सहयोग दिया। समय के साथ, श्रद्धालुओं के योगदान से मंदिर का विस्तार हुआ और आज यह टाइल्स जैसी आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित एक भव्य आस्था का केंद्र है। यह मंदिर न केवल धार्मिक महत्व रखता है, बल्कि सामूहिक सहयोग और सामुदायिक भावना का भी प्रतीक है।
अन्य शक्तिपीठों से संबंध और आस्था का केंद्र
स्थानीय ग्रामीण पोठिया की इस परंपरा को बांका जिले के पंजवारा थाना क्षेत्र के लखपुरा और झारखंड के गोड्डा जिले के मेहरमा प्रखंड अंतर्गत चौरा गांव के शक्तिपीठों से भी जोड़ते हैं। हालांकि, इन मंदिरों की स्थापना और उनके आपसी संबंधों की कोई ऐतिहासिक पुष्टि नहीं हुई है। इन दावों के बावजूद, पोठिया का यह मंदिर ग्रामीणों के लिए गहरी आस्था, सामूहिक सहयोग और अपनी सांस्कृतिक विरासत का एक महत्वपूर्ण केंद्र बना हुआ है।
इस वर्ष दुर्गा पूजा की मुख्य तिथियां
मंदिर की पारंपरिक विधि-विधान के अनुसार, सप्तमी को मां की प्रतिमा मंदिर में प्रवेश कर चुकी है। ग्रामीणों और पंडितों के बताए अनुसार, इस वर्ष दुर्गा पूजा की तिथियां इस प्रकार हैं:
- अष्टमी: 18 और 19 अक्टूबर
- नवमी: 20 अक्टूबर
- दशमी: 21 अक्टूबर
इन तिथियों पर मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना और अनुष्ठान किए जाएंगे, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु भाग लेंगे। यह परंपरा गांव की पहचान का एक अभिन्न अंग है और हर साल उत्साह के साथ मनाई जाती है।








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