Bihar Railway Tunnel: बिहार के गया-कोडरमा रेलखंड पर स्थित गुरपा-गुझंडी घाट की तीन ऐतिहासिक रेल सुरंगों को आधुनिक इंजीनियरिंग तकनीकों से मजबूत किया जाएगा। भारतीय रेलवे ने इन 120 साल पुरानी सुरंगों के सुदृढ़ीकरण के लिए एक विस्तृत कार्ययोजना तैयार की है। डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर (DFC) और भारी मालगाड़ियों के बढ़ते परिचालन को देखते हुए यह कदम उठाया जा रहा है, जिससे रेल परिचालन और भी सुरक्षित और सुगम बन सके।
ऐतिहासिक सुरंगों का 120वां वर्ष
ब्रिटिश शासनकाल के दौरान इन तीनों सुरंगों का निर्माण 6 दिसंबर 1906 को पूरा हुआ था। वर्ष 2026 में ये सुरंगें अपने निर्माण के 120वें वर्ष में प्रवेश करेंगी। अपनी स्थापना के बाद से ये सुरंगें गया-कोडरमा रेलखंड की एक महत्वपूर्ण विरासत बनी हुई हैं। इनकी लंबाई क्रमशः 496 मीटर, 454 मीटर और 395 मीटर है, जो उस दौर की इंजीनियरिंग का अद्भुत नमूना पेश करती हैं।






आधुनिक तकनीक से बढ़ेगी सुरक्षा
पूर्व मध्य रेलवे के महाप्रबंधक और धनबाद मंडल के मंडल रेल प्रबंधक (डीआरएम) अखिलेश कुमार मिश्रा ने हाल ही में गुरपा-गुझंडी घाट सेक्शन का गहन निरीक्षण किया। इस दौरान उन्होंने तकनीकी विशेषज्ञों के साथ सुरंगों की वर्तमान स्थिति, सुरक्षा व्यवस्था और भविष्य की जरूरतों पर विस्तृत चर्चा की। रेलवे अधिकारियों ने बताया कि विशेषज्ञ एजेंसियों की मदद से इन बिहार रेलवे टनल का विस्तार, पुनर्रचना और अतिरिक्त संरचनात्मक मजबूती का कार्य किया जाएगा। इससे इन्हें भविष्य की आवश्यकताओं के अनुरूप अधिक सुरक्षित और टिकाऊ बनाया जा सकेगा।
बढ़ती मालगाड़ियों के लिए अहम
गया-कोडरमा रेलखंड देश के सबसे व्यस्त रेलमार्गों में से एक है, जहां प्रतिदिन लगभग 300 यात्री और मालगाड़ियां गुजरती हैं। इन सुरंगों के मजबूत होने से लंबी और अधिक भार क्षमता वाली मालगाड़ियों के संचालन में आसानी होगी। पिछले 100 से अधिक वर्षों में इन सुरंगों को जल रिसाव, चट्टानों से पत्थर गिरने और प्राकृतिक क्षरण जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ा है, लेकिन नियमित रखरखाव के कारण इनका सुरक्षित संचालन जारी रहा है।
गुरपा-गुझंडी घाट सेक्शन को ग्रैंड कॉर्ड परियोजना का सबसे चुनौतीपूर्ण हिस्सा माना जाता था। लगभग 22 किलोमीटर लंबे इस पहाड़ी क्षेत्र में हजारों मजदूरों ने बिना आधुनिक मशीनों के, हथौड़ी, छैनी, फावड़े और डायनामाइट की मदद से इन सुरंगों का निर्माण किया था। सुरंगों के भीतर की गई ईंट और पत्थर की मेहराबी लाइनिंग आज भी भारतीय रेलवे की ऐतिहासिक इंजीनियरिंग का उत्कृष्ट उदाहरण है। यह सुदृढ़ीकरण परियोजना उनकी विरासत को बनाए रखते हुए भविष्य की रेल परिवहन आवश्यकताओं को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।








