Emergency 1975: आज से ठीक 51 साल पहले, 25 जून 1975 को भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का एक काला अध्याय शुरू हुआ था। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सलाह पर राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने संविधान के अनुच्छेद 352 का प्रयोग करते हुए देश में आपातकाल की घोषणा की थी।
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यह वह दौर था जब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर पाबंदी लगा दी गई थी, प्रेस पर कड़ा नियंत्रण था और हजारों विपक्षी नेताओं को जेल में डाल दिया गया। भारतीय संविधान और न्यायपालिका के सामने भी नई चुनौतियाँ खड़ी हो गई थीं। इस अवधि ने देश को कई महत्वपूर्ण सबक सिखाए, जिससे भविष्य में ऐसी स्थिति से बचने के लिए संवैधानिक सुरक्षा उपाय मजबूत किए गए।






इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले ने बढ़ाई थी राजनीतिक उथल-पुथल
आपातकाल की पृष्ठभूमि 12 जून 1975 को इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक महत्वपूर्ण फैसले से बनी। अदालत ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को 1971 के लोकसभा चुनाव में सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग का दोषी पाया था। इस फैसले से उनका चुनाव रद्द हो गया और उन्हें छह वर्षों के लिए किसी भी निर्वाचित पद पर रहने के लिए अयोग्य घोषित कर दिया गया। इस निर्णय के बाद देश भर में उनके इस्तीफे की मांग जोर पकड़ने लगी, जिससे राजनीतिक संकट गहराता चला गया।
मौलिक अधिकारों का निलंबन और हजारों गिरफ्तारियां
आपातकाल की घोषणा होते ही संविधान के अनुच्छेद 358 और 359 के तहत नागरिकों के कई मौलिक अधिकार निलंबित कर दिए गए। यह स्वतंत्र भारत में शांति काल के दौरान लगाया गया पहला राष्ट्रीय आपातकाल था। नागरिकों को सभा करने, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अदालतों में चुनौती देने के अधिकार से वंचित कर दिया गया। मीसा (MISA) कानून के तहत बिना किसी मुकदमे के हजारों विपक्षी नेताओं और कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर जेलों में डाल दिया गया।
प्रेस पर कड़ा पहरा: सेंसरशिप और ‘समाचार’ का जन्म
26 जून 1975 से देश के अखबारों पर प्री-सेंसरशिप लागू कर दी गई। किसी भी समाचार, संपादकीय या तस्वीर के प्रकाशन से पहले सरकारी अनुमति लेना अनिवार्य कर दिया गया था। विदेशी संवाददाताओं की रिपोर्टिंग पर भी प्रतिबंध लगाए गए। बाद में, प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया को समाप्त कर दिया गया और देश की प्रमुख समाचार एजेंसियों का विलय कर ‘समाचार’ नामक एक नई संस्था का गठन किया गया, जिससे सूचना पर सरकारी नियंत्रण और मजबूत हो गया।
संविधान में बड़े बदलाव और नसबंदी अभियान
आपातकाल के दौरान संसद ने 38वां, 39वां और 42वां संविधान संशोधन पारित किया। इन संशोधनों ने न्यायिक समीक्षा की शक्तियों को सीमित कर दिया, केंद्र सरकार के अधिकार बढ़ाए और लोकसभा तथा विधानसभा का कार्यकाल पांच वर्ष से बढ़ाकर छह वर्ष कर दिया। इस अवधि का सबसे विवादास्पद पहलू नसबंदी अभियान था। जनसंख्या नियंत्रण के नाम पर 1975-76 और 1976-77 के दौरान 1.07 करोड़ से अधिक नसबंदी प्रक्रियाएं की गईं, जिसमें कई जगह जबरन नसबंदी के आरोप भी लगे।
आपातकाल की समाप्ति और शाह आयोग की रिपोर्ट
21 मार्च 1977 को आपातकाल समाप्त हुआ और इसके बाद हुए आम चुनाव में कांग्रेस को करारी हार का सामना करना पड़ा। जनता पार्टी केंद्र में सत्ता में आई और उसने आपातकाल के दौरान हुई ज्यादतियों की जांच के लिए शाह आयोग का गठन किया। शाह आयोग ने अपनी रिपोर्ट में बिना मुकदमे के गिरफ्तारियां, प्रेस सेंसरशिप, जबरन नसबंदी और प्रशासनिक शक्तियों के दुरुपयोग जैसी कई गंभीर अनियमितताओं का खुलासा किया। आयोग की सिफारिशों के आधार पर 44वें संविधान संशोधन के जरिए भविष्य में आपातकाल लगाने की प्रक्रिया को और कड़ा बनाया गया, जिसमें ‘आंतरिक अशांति’ की जगह ‘सशस्त्र विद्रोह’ को आधार बनाया गया। यह संशोधन भारतीय लोकतंत्र की सुरक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण कदम साबित हुआ।








