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आपका पासपोर्ट सिर्फ घूमने के लिए है, नागरिकता का सबूत नहीं! केंद्र सरकार ने कर दिया साफ, जानिए क्या कहता है भारत का कानून

passport citizenship: विदेश मंत्रालय ने पासपोर्ट को केवल यात्रा दस्तावेज बताया, सरकारी योजनाओं में नागरिकता के अंतिम प्रमाण के तौर पर इसके इस्तेमाल पर बढ़ती भ्रांति को किया दूर।

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passport citizenship: केंद्र सरकार ने बिहार समेत पूरे देश में पासपोर्ट को लेकर एक बड़ा और महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण जारी किया है। विदेश मंत्रालय ने साफ किया है कि भारतीय पासपोर्ट सिर्फ एक यात्रा दस्तावेज है, इसे नागरिकता का निर्णायक प्रमाण नहीं माना जाना चाहिए। यह घोषणा उन बढ़ती भ्रांतियों के बीच आई है, जहां लोग पासपोर्ट को नागरिकता का अंतिम प्रमाण मान रहे थे और विभिन्न सरकारी योजनाओं में इसका इस्तेमाल भी इसी आधार पर कर रहे थे।

विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि भारतीय पासपोर्ट सिर्फ एक ट्रैवल डॉक्यूमेंट है। इसे नागरिकता का निर्णायक प्रमाण नहीं माना जाना चाहिए।

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पासपोर्ट की असली पहचान क्या है?

पासपोर्ट का मुख्य उद्देश्य एक व्यक्ति को अंतरराष्ट्रीय यात्रा के लिए पहचान और राष्ट्रीयता साबित करने वाला दस्तावेज प्रदान करना है। यह धारक को विदेश में भारतीय दूतावासों और वाणिज्य दूतावासों से सुरक्षा और सहायता का अधिकार देता है। केंद्र सरकार के अनुसार, यह केवल यात्रा की सुविधा के लिए जारी किया जाता है, न कि किसी व्यक्ति की नागरिकता को अंतिम रूप से साबित करने के लिए।

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क्यों करना पड़ा ये स्पष्टीकरण?

हाल के दिनों में, पासपोर्ट को लेकर कई तरह की गलतफहमियां सामने आई थीं। खासकर कुछ सरकारी योजनाओं में इसके उपयोग और अवैध प्रवासियों द्वारा जाली दस्तावेजों के सहारे नागरिकता का दावा करने के मामलों में यह भ्रम बढ़ा था। विदेश मंत्रालय ने इस स्पष्टीकरण के माध्यम से यह रेखांकित किया है कि पासपोर्ट को नागरिकता का ढाल नहीं बनाया जा सकता है। यह कदम अवैध प्रवासियों और जाली दस्तावेजों पर सख्ती बरतने की सरकार की नीति का हिस्सा भी माना जा रहा है।

इस स्पष्टीकरण से अब सरकारी विभागों और आम जनता के बीच पासपोर्ट की वास्तविक कानूनी स्थिति को लेकर कोई भ्रम नहीं रहेगा। यह सुनिश्चित करेगा कि नागरिकता से जुड़े मामलों में उचित और निर्णायक दस्तावेजों की ही पड़ताल हो, जिससे नियमों का उल्लंघन करने वालों पर लगाम लगाई जा सके।

अब समझिए विस्तार से मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि पासपोर्ट भारत की नागरिकता का अंतिम या पुख्ता सबूत नहीं है। यह तकनीकी स्पष्टीकरण पासपोर्ट सेवा दिवस के अवसर पर ई-पासपोर्ट के फायदों के बारे में बताते हुए दिया गया था। इस बयान के बाद अब यह सवाल उठ खड़ा हुआ है कि यदि विदेश यात्रा कराने वाला और कड़ी पुलिस वेरिफिकेशन के बाद जारी होने वाला पासपोर्ट भी नागरिकता का पक्का प्रमाण नहीं है, तो फिर वह कौन सा दस्तावेज है जो इसे साबित करता है?

पासपोर्ट एक्ट और नागरिकता का कानूनी पेच

विदेश मंत्रालय का यह रुख कई लोगों के लिए थोड़ा अटपटा हो सकता है, क्योंकि पासपोर्ट बनाने का पूरा कानून इसी आधार पर काम करता है कि इसका धारक एक भारतीय नागरिक है। पासपोर्ट अधिनियम, 1967 की धारा 5 और 6(2)(a) के तहत, पासपोर्ट अथॉरिटी पूरी जांच-पड़ताल के बाद ही पासपोर्ट जारी करती है। यदि कोई आवेदक भारत का नागरिक नहीं पाया जाता, तो उसे पासपोर्ट देने से साफ इनकार कर दिया जाता है।
विदेश मंत्रालय के अनुसार, पासपोर्ट नागरिकता का ‘सबूत’ तो हो सकता है, लेकिन यह ‘निर्णायक या अंतिम सबूत’ नहीं है। सरकार के पास कानूनी तौर पर यह अधिकार सुरक्षित है कि अगर उसे पता चले कि नागरिकता गलत तरीके से या तथ्य छिपाकर हासिल की गई है, तो वह पासपोर्ट जब्त या रद्द कर सकती है।

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यह मुद्दा केवल पासपोर्ट तक ही सीमित नहीं है। हाल ही में मतदाता सूचियों के ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ (SIR) के दौरान सुप्रीम कोर्ट के सामने भी यह कानूनी सवाल आया था कि क्या मौजूदा मतदाताओं से अपनी योग्यता साबित करने के लिए नए दस्तावेज मांगे जा सकते हैं। वोटर आईडी कार्ड यह प्रमाणित करता है कि कोई व्यक्ति मतदाता के रूप में दर्ज है, लेकिन यह स्वतंत्र रूप से नागरिकता साबित नहीं करता। जनप्रतिनिधित्व कानून, 1950 के अनुसार, केवल नागरिक ही वोटर बन सकते हैं। हालांकि, चुनाव अधिकारियों को यह जांचने का अधिकार है कि किसी का नाम मतदाता सूची में वैधानिक रूप से सही शामिल है या नहीं।
नागरिकता का असली प्रमाण क्या? गृह मंत्रालय ने संसद में क्या कहा था?
भारत में ऐसा कोई एक सर्टिफिकेट मौजूद नहीं है जो जन्म के साथ हर नागरिक को अपने आप मिल जाए और जिसे नागरिकता का सर्वमान्य प्रमाण माना जाए। फरवरी 2020 में गृह मंत्रालय (MHA) ने संसद में स्पष्ट किया था कि आधार, पासपोर्ट, वोटर आईडी, पैन कार्ड या जन्म प्रमाण पत्र को नागरिकता का पक्का सबूत नहीं माना जा सकता।

भारत में नागरिकता संविधान और नागरिकता अधिनियम, 1955 से तय होती है। यह नागरिकता जन्म, वंश, पंजीकरण, प्राकृतिककरण या किसी क्षेत्र के भारत में शामिल होने के आधार पर मिल सकती है। कानूनी मामलों में अदालतें भी किसी एक दस्तावेज को अंतिम मानने के बजाय कई दस्तावेजों और परिस्थितियों को मिलाकर देखती हैं।
तो फिर कौन सा दस्तावेज है निर्णायक?
इसका सीधा जवाब है – कोई एक ‘नेशनल सिटिजनशिप कार्ड’ भारत ने कभी नहीं अपनाया है। आधार कार्ड कानूनन सिर्फ भारत के निवासियों के लिए है, न कि केवल नागरिकों के लिए। आधार एक्ट में भी स्पष्ट रूप से कहा गया है कि यह नागरिकता का प्रमाण नहीं है। पैन कार्ड टैक्स चुकाने वालों की पहचान के लिए है और राशन कार्ड कल्याणकारी योजनाओं में शामिल होने का सबूत है, इनका नागरिकता से सीधा संबंध नहीं।

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नागरिकता प्रमाण पत्र, जो नागरिकता अधिनियम के तहत जारी होता है, एकमात्र ऐसा दस्तावेज है जो सिटिजनशिप को सीधे तौर पर प्रमाणित करता है। लेकिन यह केवल उन लोगों को मिलता है जिन्होंने रजिस्ट्रेशन या प्राकृतिककरण के जरिए नागरिकता ली है, न कि जन्म से नागरिकता पाने वाले बहुसंख्यक भारतीयों को। भारत की कानूनी व्यवस्था लंबे समय से इस धारणा पर काम कर रही है कि जब तक कोई विशेष विवाद न हो, अधिकांश लोग नागरिक हैं। लेकिन जब भी नागरिकता के सत्यापन या मतदाता सूची की जांच की बात आती है, तो एक सर्वमान्य दस्तावेज की कमी साफ नजर आती है।

विदेश मंत्रालय के इस बयान ने फिर से यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि जिस देश में वोट देने, सरकारी पद पाने और संवैधानिक अधिकारों के लिए नागरिकता जरूरी है, वहां एक आम नागरिक अपनी भारतीय नागरिकता साबित करने के लिए आखिर किस दस्तावेज पर पूरी तरह भरोसा करे। यह स्थिति आने वाले समय में एक बड़े नीतिगत बदलाव की मांग कर सकती है।

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