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आज है निर्जला एकादशी! इस व्रत से खुलेंगे स्वर्ग के द्वार, बस न करें ये 8 गलतियां

Bihar Nirjala Ekadashi: 24 एकादशियों में सर्वश्रेष्ठ मानी जाने वाली निर्जला एकादशी का व्रत इस साल 25 जून को रखा जाएगा। इस दिन अन्न और जल त्यागने के साथ ही कुछ विशेष नियमों का पालन करना अनिवार्य है, अन्यथा व्रत का फल नहीं मिलता।

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Bihar Nirjala Ekadashi: सनातन धर्म में निर्जला एकादशी का व्रत सभी 24 एकादशियों में सबसे श्रेष्ठ माना जाता है। मान्यता है कि इस एक व्रत को करने से सालभर की सभी एकादशियों का फल प्राप्त होता है और मोक्ष का द्वार खुल जाता है। यह व्रत महाभारत काल से जुड़ा है, जब भीम ने अपने जीवनकाल में केवल इसी एक एकादशी का व्रत रखा था, इसीलिए इसे भीमसेन एकादशी भी कहते हैं। पद्म पुराण में भी इस व्रत की महिमा का विस्तार से वर्णन किया गया है। पंडित राकेश झा के अनुसार, निर्जला एकादशी पर कुछ विशेष नियमों का पालन करना अत्यंत आवश्यक है। इन नियमों की अनदेखी करने से व्रत का पूर्ण फल नहीं मिलता।

निर्जला एकादशी पर भूलकर भी न करें ये गलतियां

निर्जला एकादशी का व्रत अत्यंत कठिन होता है, क्योंकि इसमें अन्न और जल दोनों का त्याग किया जाता है। व्रत के दौरान कुछ ऐसी बातें हैं, जिनसे बचना चाहिए। इन गलतियों को करने से व्रत खंडित हो सकता है और उसका शुभ फल नहीं मिलता:

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  • इस दिन अन्न और जल का त्याग किया जाता है। गेहूं, चावल आदि अन्न ग्रहण न करें। हालांकि, विशेष परिस्थितियों में पानी पीने की छूट हो सकती है।
  • ब्रह्मचर्य का पालन करना अनिवार्य है।
  • दिन के समय सोने से बचें।
  • तुलसी के पत्ते नहीं तोड़ने चाहिए।
  • तुलसी में जल अर्पित नहीं करना चाहिए, क्योंकि एकादशी पर तुलसी माता भी भगवान विष्णु के लिए निर्जला व्रत रखती हैं।
  • एकादशी से एक दिन पहले और एकादशी के दिन चावल का सेवन न करें।
  • क्रोध करने से बचना चाहिए।
  • किसी की बुराई या निंदा न करें।

निर्जला एकादशी व्रत के महत्वपूर्ण नियम और दान का महत्व

जो भक्त पूर्ण श्रद्धा से निर्जला एकादशी का व्रत करते हैं, उन्हें कुछ विशेष नियमों का पालन करना चाहिए और दान-पुण्य का महत्व समझना चाहिए। यह व्रत भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करने का एक सीधा मार्ग है।

  • जो लोग निर्जला व्रत नहीं कर सकते, वे शाम के समय सात्विक फलाहार कर सकते हैं।
  • तुलसी माता को दीपक जलाकर अर्पित करें।
  • शाम के समय भगवान विष्णु की विधि-विधान से पूजा करें और जागरण करें।
  • दान-पुण्य की सामग्री एकादशी के दिन इकट्ठा करें, लेकिन उनका दान द्वादशी तिथि में करें।
  • जल से भरे कलश, पंखा, चीनी, चने की दाल और चावल जैसी वस्तुओं का दान अवश्य करें।

इस प्रकार, निर्जला एकादशी के नियमों का पालन करने से न केवल पुण्य की प्राप्ति होती है, बल्कि यह आत्म-संयम और भक्ति का भी प्रतीक है।

( डिस्क्लेमर: इस आलेख में दी गई जानकारियों पर हम यह दावा नहीं करते कि ये पूर्णतया सत्य एवं सटीक हैं। विस्तृत और अधिक जानकारी के लिए संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें।)

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